सिर्फ तीस दिनों की मोहलत क्यों?

भारत के आका डोनाल्ड ट्रम्प का आदेश हुआ है भारत चाहे तो रुस से एक महीने तेल का आयात कर सकता है। हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि हमारे देश के पास सिर्फ 24-25 दिनों के पेट्रोल, डीजल, गैस वगैरह मौजूद हैं। जहां से हमारे आका ने तेल खरीदने की अनुमति दी है वह वही रूस है अभी जहां से कोई पुरानी बात नहीं है, मोदी जी को रुस से तेल आयात करने पर 50 और फीसदी टैरिफ की धमकी दी थी और वेनेजुएला से तेल लेने का आदेश जारी किया था। वे बड़े अचानक ही पिट गये।

विदित हो ईरान ने अपने होर्मुज से सिर्फ रुस और चीन के जहाजों को निकलने देने की बात कही है। जिससे ना तो मध्य एशिया के तेल उत्पादक राष्ट्र हमें तेल भेज पा रहे हैं और ना अमेरिका और उसका अपहरित देश वेनेजुएला। ईरान जैसे पुराने मित्र राष्ट्र को नाराज़ करने का हमें यह सिला मिला है। हमारे मोदी जी ने मध्यपूर्व के देशों से कई पदक पहनकर सम्मान और दोस्ती का जो ढिंढोरा पीटा था। वह डोनाल्ड ट्रम्प की यारी में स्वाहा हो गया है।

अमेरिका के आगे सरेंडर साहिब अब किस मुंह से रुस से तेल की फरियाद करेंगे। यदि वह भी इंकार कर दे या पचास फीसदी टैरिफ की बात कहे तो आका क्या कर लेंगे? रुस के सस्ते तेल के साथ साहिब की अमेरिकी भक्ति ने जो ख़लल डाला है उससे रुस को कितना नुकसान झेलना पड़ा होगा यह गांठ खुलना अब सहज नहीं होगा। फिर सिर्फ तीस दिनों के लिए। अच्छा आदेश नहीं है।

मोदी जी की कथित कामयाब विदेश नीति की पोल बुरी तरह खुल चुकी है उन्होंने देश को एक गहरे गड्ढे में धकेल दिया है। वे ऐप्सटीन फाइल में निश्चित ही बुरी तरह फंसे हुए हैं इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प का आदेश शिरोधार्य करना ज़रूरी है। अपने भले के लिए देश भाड़ में झोंक दिया गया है। उधर, ट्रम्प की हालत भी पतली है एप्स्टीन फाइल से अवाम को भटकाने के लिए ईरान पर इज़राइल से हमला करवाया गया और फिर अमेरिका भी शामिल हो गया।

सोचा था अयातुल्ला खामेनेई को मार कर अपना सिक्का जमा लिया जाएगा। लेकिन एक छोटे से 9 करोड़ की आबादी वाले गरीब देश ईरान ने जिस तरह से युद्ध क्षेत्र में अमेरिका-इजराइल को धूल चटाई है और डट कर खड़ा है ट्रम्प की कल्पना से परे है। अब तो अमेरिका से डरे मुस्लिम देश शिया-सुन्नी का भेदभाव भूलकर एक हुए जा रहे हैं। दूसरी ओर यूरोपीय देशों में से स्पेन, इटली अमेरिका पर अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध नीति के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाकर छिटकते जा रहे हैं। कहना ना होगा, विश्व पटल पर ईरान की ताकत मज़बूत हो रही है।

अब देखना यह है कि मानवाधिकार का पक्षधर और नोबेल शांति पुरस्कार का आरज़ूमंद अमेरिका किस तरह ईरान के आगे घिघियाते हुए समर्पण करता है, फिलीस्तीन को आज़ाद करता है या नहीं जिसके लिए ईरान कुर्बान हो रहा है अथवा अपने अंतिम अस्त्र परमाणु बम का इस्तेमाल करता है। यहां यह भी कहा जा रहा है कि ईरान ने भी युद्ध के बीच परमाणु बम बना लिया है।

यदि तृतीय विश्व युद्ध की परिणति होती है तो बहुत दुखद होगी। भारत की ढुलमुल विदेश नीति ने आज देश को इतना कमज़ोर कर दिया है कि वह अब शांति की अपील करने लायक भी नहीं रहा। पूर्व के दो देश चीन और रुस तथा अमेरिका की जनता से ही इसे बचाने की उम्मीद है।

तीस दिनों की मोहलत के पीछे कहीं यही रणनीति पीछे से तो काम नहीं कर रही है। क्योंकि अमेरिका भली-भांति समझ गया है यदि वह कदम पीछे नहीं हटाता है तो इस बार परमाणु बम कोई और चलाएगा। तब सब कुछ बर्बाद हो जाएगा। इससे झुकने में ही अमेरिका की सलामती है। ओसामा बिन लादेन को याद करिए जिसने मिनटों में अमरीका में बर्बादी ला दी थी। सहनशीलता की पराकाष्ठा जब खत्म होती है तो अंजाम बुरा होता है। भारत को एक सख़्त और मज़बूत प्रधानमंत्री की ज़रूरत है। यदि मोदी जी रहते हैं तो उनका डोनाल्ड को खुश रखने नाचना गाना चलता रहेगा।आईए देश को फासिस्टवादी ताकतों से मुक्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित हों।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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